मराठी मुद्दे पर एमएनएस कार्यकर्ताओं की हिंसा : महाराष्ट्र में क्यों हो रही है “विलासराव पैटर्न” की चर्चा?

2008 में जब कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री थे, तब आरोप लगे थे कि उनकी सरकार एमएनएस की ओर से की गई हिंसा पर जानबूझकर नरम रुख अपना रही थी, क्योंकि एमएनएस के जरिए शिवसेना के पारंपरिक मराठी वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती थी. नतीजा यह रहा कि महाराष्ट्र में यूपीए गठबंधन फिर से सत्ता में लौट आया, क्योंकि शिवसेना के वोट बंट गए.
साल 2020 में राज ठाकरे ने अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लिए हिंदुत्ववाद की विचारधारा को अपना लिया था, लेकिन अब फिर एक बार उनकी राजनीति मराठीवाद की ओर उन्मुख हो चली है. बीते एक हफ्ते में तीन बार राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में गैर-मराठी नागरिकों के साथ मारपीट की, वजह थी- मराठी न बोलना. MNS कार्यकर्ताओं की ओर से हिंसा का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन सियासी गलियारों में जो बात सबको हैरान कर रही है, वह है भाजपा का नरम रुख. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, जो गृहमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं, एमएनएस के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते नहीं दिख रहे. राज ठाकरे के प्रति कुछ ऐसा ही रवैया महाराष्ट्र में कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे विलासराव देशमुख ने भी साल 2008 में अपनाई थी.
गुड़ी पाडवा रैली में राज ठाकरे ने धमकी दी थी कि महाराष्ट्र में जो मराठी नहीं बोलेगा, उसे चांटा पड़ेगा. उन्होंने एमएनएस कार्यकर्ताओं को बैंकों और अन्य संस्थानों में जाकर यह जांचने का आदेश दिया कि वहां मराठी का उपयोग हो रहा है या नहीं. इसके बाद एमएनएस के कार्यकर्ता भीड़ की शक्ल में हाउसिंग सोसाइटियों, बैंकों और मॉल्स में मराठी भाषा का इस्तेमाल करवाने पहुंचने लगे. अगर कोई मराठी में बात करने में असमर्थ होता और बहस करने की कोशिश करता तो उसकी पिटाई होती.
MNS के ये हथकंडे आश्चर्यजनक नहीं हैं, खासकर तब जब पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए जूझ रही है. साल 2009 से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया और अब शून्य विधायक संख्या पर पहुंच गया है. भाषा आधारित हिंसक कार्रवाइयों के जरिए एमएनएस आगामी बीएमसी चुनाव से पहले मराठी मानुष का साथ हासिल करना चाहती है. फिलहाल राज्य की कोई भी पार्टी मराठी का मुद्दा नहीं उठा रही है, जिससे एमएनएस को फिर से इस मैदान में कूदने का मौका मिल रहा है. 2009 के विधानसभा चुनाव में एमएनएस को कुछ हद तक कामयाबी मिली थी, जब पर- प्रांतीय विरोध के मुद्दे पर उसने चुनाव लड़ा था.
2008 में जब कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री थे, तब आरोप लगे थे कि उनकी सरकार एमएनएस की ओर से की गई हिंसा पर जानबूझकर नरम रुख अपना रही थी, क्योंकि एमएनएस के जरिए शिवसेना के पारंपरिक मराठी वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती थी. नतीजा यह रहा कि महाराष्ट्र में यूपीए गठबंधन फिर से सत्ता में लौट आया, क्योंकि शिवसेना के वोट बंट गए.
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फडणवीस भी उसी रणनीति को आजमा रहे हैं. एक मजबूत एमएनएस भाजपा के लिए फायदेमंद है और न सिर्फ उद्धव ठाकरे की शिवसेना बल्कि एकनाथ शिंदे की पार्टी के लिए भी नुकसानदायक. अगर भाजपा अकेले नगर निकाय चुनाव लड़ती है तो एमएनएस के कारण होने वाला वोटों का बिखराव भाजपा के पक्ष में जा सकता है.
इस बीच भाजपा और राज ठाकरे के बीच करीबी भी देखी गई है. पिछले साल लोकसभा चुनाव में ठाकरे ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की थी. विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि फडणवीस ही मुख्यमंत्री बनेंगे. अब तक फडणवीस ने केवल एक हल्का बयान दिया है कि महाराष्ट्र में मराठी के इस्तेमाल की मांग करना गलत नहीं है, लेकिन कानून अपना काम करेगा, लेकिन एमएनएस के कार्यकर्ताओं की ‘चांटा नीति’ पर उनकी चुप्पी बहुत कुछ कह रही है.