भाषा- सिकुड़ती मातृभाषाएं
पिछले दिनों केरल जाना हुआ। वहां की दुकानों पर लगे बोर्ड और होर्डिंग्स देख कर हैरानी हुई। अधिकतर दुकानों, दफ्तरों, जगहों के नाम दिल्ली की तरह ही अंगरेजी में लिखे थे। मलयालम में कभी-कभार ही कोई बोर्ड लगा दिखता था। हमें लेने आर्इं हमारी मित्र स्थानीय सरकारी कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं। जब उनसे पूछा कि यहां सब जगह मलयालम की जगह अंगरेजी क्यों दिखाई दे रही है? तो उन्होंने बताया कि जब तक लोगों के पास पैसा नहीं आता, वे मलयालम माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं,
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