बाजार की मार में भी जगमगाते दीये
मृणाल वल्लरी बहुत फर्क है पिछली और इस दिवाली में। लिखने, सोचने और बोलने का फर्क है। पिछली दिवाली के पहले तक एक एडॉप्टेड भाषा के तहत बस त्योहार और बाजार को कोसना। दशहरा मैदान में रावण के बाजार से लेकर करवा चौथ और दिवाली से लेकर दिल्ली जैसे महानगर में पिछले एक दशक में नया सजा छठ पूजा का बाजार। हर सोसायटी और मोहल्ले के बाहर लगा बुध, शनि या रवि बाजार। चमचमाता हुआ शॉपिंग मॉल का बाजार। पिछली दिवाली मनाने के बाद बाजार को कोस ही रहे थे
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