हिंदी का बाजार
तीन सौ साठ डिग्री का पूरा एक चक्कर लगाकर घड़ी की सुइयां पूरा करती हैं एक दिन। दिनों के योग से बनता है साल और हर साल हम तीन सौ साठ डिग्री का पूरा एक चक्कर लगाकर सितंबर में एक जाने-पहचाने सवाल से जूझने लगते हैं। यह सवाल होता हिंदी को लेकर। आज बाजार ने भाषाओं को लेकर एक ऐसी मानसिकता का मकड़जाल बुना है कि हम खुद-ब-खुद उसमें फंसते चले जा रहे हैं, जिसके कारण भारत में ही लोगों की अपनी भाषा हिंदी के प्रति कोई खास रुचि नहीं
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