निराशा के अंधकार में उजाले की किरण जैसा है सोहनलाल द्विवेदी का गीत – ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’
हताशा, निराशा, उदासी, पराजय और हीनता प्रतिस्पर्धात्मक समाज के साइड इफेक्ट्स हैं। हर दिन के अखबार का कोई न कोई कोना इन अंधेरों की स्याह स्याही से लाल होता है। हार जाने का डर और हार जाने पर सब कुछ लुट जाने का भाव जीवन को समाप्त कर देने के एकमेव विकल्प की ओर रोशनी डालने लगती है। यह रोशनी ही आज के दौर का सबसे बड़ा अंधकार है। ऊपर जो पंक्तियां लिखी गई हैं वो न जाने किस मनःस्थिति में न जाने किसके लिए लिखी गई हैं लेकिन जब
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