डॉक्टरी पढ़ने के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ लड रही दलित छात्रा ने की सुसाइड

डॉक्टरी की पढ़ाई में एडमिशन के लिए जरूरी नीट परीक्षा का विरोध कर रही दलित छात्रा एस अनिता ने शुक्रवार (1 सितंबर) को खुदकुशी कर ली है। ये घटना तब हुई है जब 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को कहा कि मेडिकल में दाखिले की प्रक्रिया के लिए सभी राज्यों को नीट यानी की नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट (NEET) का ही पालन करना होगा। इसके बाद केन्द्र ने भी कहा था कि इस मामले में तमिलनाडु को छूट नहीं जा सकती है। दलित छात्रा एस अनीता ने नरेन्द्र मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध किया था और अदालत में इसे चुनौती दी थी। नीट ने एआईपीएमटी (अखिल भारतीय प्री-मेडिकल टेस्ट) या राज्य के मेडिकल कॉलेजों द्वारा कराई जाने वाली परीक्षा की जगह ली है। हालांकि, कई कॉलेज और संस्थानों ने आदेश पर अदालत से स्टे लिया हुआ है और निजी तौर पर एमबीबीएस और बीडीएस कोर्स में दाखिले के लिए परीक्षा करा रहे हैं। तमिलनाडु में नीट परीक्षा के खिलाफ बड़े स्तर पर राजनीतिक पार्टियों में सहमति है कि इससे राज्य के छात्रों को अस्थायी तौर पर राहत की मांग की गई थी।

14 अगस्त को तमिलनाडु सरकार ने राज्य के सरकारी कॉलेजों में दाखिले के लिए नीट परीक्षा से छात्रों को छूट देने के लिए प्रस्तावित अध्यादेश का मसौदा सोमवार को केंद्र सरकार को सौंपा था। इससे पहल केन्द्र सरकार ने तमिलनाडु को इस बावत राहत देने की बात कही थी। केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार इस तरह के अनुरोध पर सिर्फ एक साल के लिए विचार कर सकती है। लेकिन बाद में केन्द्र अपने इस बयान से पीछे हट गई। बता दें कि दलित छात्रा अनीता ने बारहवीं में 1200 में से 1176 अंक हासिल किये थे। उसने इंजीनियरिंग के लिए कट ऑफ मार्क्स के 199.75 और मेडिकल के लिए कट ऑफ मार्क्स के 196.75 अंक हासिल किये थे। उसे मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी ने एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग ने अपने यहां एक सीट भी ऑफर किया था, लेकिन अनीता डॉक्टर बनना चाहती थी इसलिए उसने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

हालांकि अनीता जब नीट की परीक्षा देने गई तो उसमें सफल नहीं हो सकी। नीट परीक्षा सभी तरह की मेडिकल कोर्स में दाखिले के लिए अनिवार्य है। नीट परीक्षा का सिलेबस सीबीएसई पर आधारित है। तमिलनाडु के छात्रों का कहना है कि नीट पद्धति से उन छात्रों को फायदा पहुंचता है जो सीबीएसई पाठ्यक्रम के स्कूलों में पढ़ते हैं। इसकी वजह से ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए उनसे कॉम्पीटिशन करना मुश्किल हो जाता है। अनिता के केस को नलिनी चिंदबरम लड़ रही थीं। अनीता के पिता त्रिची के गांधी मार्केट में मजदूरी का काम करते हैं।

 

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